Monday, April 24, 2017

शिक्षक दंपती ने बंद नहीं होने दिया बाड़मेर का यह सरकारी स्कूल


प्रदेश में सैकड़ों सरकारी स्कूल नामांकन कम होने के कारण बंद हो गए, लेकिन जिला मुख्यालय से 25 किमी दूर एक स्कूल वहां के एक शिक्षक और उसकी पत्नी के संकल्प के चलते मर्ज होने से बच गया। उन्होंने घर-घर जाकर अभिभावकों से बच्चों को स्कूल भेजने का आग्रह किया। दो किमी के दायरे के घर-घर से बच्चों को स्कूल लाए और उनके ठहराव के तमाम जतन किए। माहौल एेसा बना कि एक साल में ही यहां अध्ययनरत छात्र 16 से बढ़कर 95 हो गए। जिस स्कूल को बंद करने का नोटिस मिला अब उसके आठवीं तक क्रमोन्नति का आग्रह हो रहा है।

भादरेस के गुरुओं की ढाणी स्कूल में अध्यापक यशंवत श्रृंगी की नियुक्ति को कुछ ही दिन हुए थे कि स्कूल में महज 16 बच्चे होने से उसके मर्ज होने का संकट आ गया। श्रृंगी ने पत्नी को बताया कि अब तो दूसरी जगह तलाशनी होगी यहां तो स्कूल बंद हो रहा है। पत्नी शीतल श्रृंगी भी बीएसटीसी बीएड हैं। दोनों ने स्कूल को मर्ज होने से बचाने की ठान ली। शीतल ने कहा कि वो भी स्कूल में नि:शुल्क पढ़ाएंगी। दोनों ने प्रधानाध्यापिका ललिता को यह बात बताई तो उन्होंने सहमति दे दी। फिर वे अभिभावकों के द्वार पहुंचे और अपना संकल्प जताया। शिक्षक और उसकी पत्नी की इस भावना पर अभिभावक भी जागरुक हुए और स्कूल में बच्चों का नामांकन बढऩे लगा। कुछ ही दिनों में स्कूल में पढ़ाई और माहौल की चर्चा फैली तो बच्चों की संख्या बढऩे लगी। एक साल में ही छात्र संख्या 95 होने पर ग्रामीणों ने स्कूल को आठवीं तक क्रमोन्नत करने का आग्रह विभाग से किया है।

जागरुक हुए ग्रामीण

स्कूल में मूलभूत सुविधाओं के लिए पहले शिक्षक दंपती और शाला प्रधान ने कोटा और झुंझुनंू से भामाशाह तैयार किए। उनके सहयोग से शिक्षण सामग्री उपलब्ध करवाई। साथ ही भवन के रंग रोगन कर विद्यालय को सुंदर बनाया। ग्रामीणों ने भावना देखी तो वे भी जुट गए और अब यहां विद्युत व नल कनेक्शन, टीनशैड का निर्माण हो गया है। ग्रामीणों को अब भरोसा है कि यहां पढ़ाई का माहौल मिलेगा।

-शुरू में विश्वास नहीं था। अध्यापक के साथ उनकी पत्नी नि:शुल्क पढ़ाने लगी तो एेतबार हुआ। अब तो हमारा स्कूल आठवीं में क्रमोन्नत होना चाहिए।- किशनलाल गर्ग, अभिभावक

-लगता नहीं कि यह वही विद्यालय है जिसके बंद होने की चर्चा थी। इस तरह समर्पण से कोई पढ़ाए तो एक भी विद्यालय बंद नहीं हो सकता।- हमीराराम, अध्यापक

-बच्चों के निजी स्कूल में प्रवेश का मानस बना चुके थे लेकिन इसके बाद सरकारी स्कूल में विश्वास दिलाया तो यहीं पर बच्चे अब सीख रहे हैं।- चंद्रपाल चारण, अभिभावक


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